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टेक्सटाइल मार्केट में कैलाश जी व्यापारियों की चुप्पी में छिपी चीख को सुनिए : राजनीश एस. लिल्हा

जो कभी नहीं हुआ वह बाजार देख रहा है, पहली बार कपड़ा बाजार में चोची घाट दिखा, पंखा लगाकर साही सुखाते व्यापारी दिखे

सूरत (योगेश मिश्रा) भारत का वह चमकता हुआ कपड़ा उद्योग केंद्र, जो कभी देश के टेक्सटाइल मैप पर गौरव की तरह उभरता था, आज आर्थिक संकट के भंवर में लब्दील होता जा रहा है। शिवशक्ति मार्केट अग्निकांड के बाद से न जाने कितने व्यापारी, मजदूर, स्टाफा जिस शहर ने देश को कपड़े पहनाए, वह खुद धीरे धीरे बेपर्दा हो, रहा कमजोर बिकवाली, बढ़ते खर्च और लेट पेमेंट के त्रिभुज में वह घूम रहा है, एक रेखा को पकड़ता है तो बाकी दो छूट जाती है यह अपनी मुसीयत कहे तो किससे आस्थिर सरकार और उसका अपना संगठन तमाशा देख रहा है।” पिछले कुछ महीनों में ही करोड़ो रूपये की ठगी की तो पुलिस शिकायत हो चुकी है। जबकि ठगी की शिकायत कितनी मुश्किल से होती है इसे व्यापारी से बेहतर कौन समझ सकता है। सूरत के कपड़ा व्यापारियों के लिए यह उम्मीद थी FOSTTA लेकिन अफसोस, इस संस्था की भूमिका समझौता करवाने वाले क्लब’ से आगे नहीं बढ़ी। क्या फोस्टा ने बीमा कंपनियों के खिलाफ मोर्चा खोता? क्या उनसे कोई पत्र व्यवहार किया क्या मुख्यमंत्री से खुला संवाद किया? क्या दिल्ली जाकर केंद्रीय कपड़ा मंत्रालय को ज्ञापन सौंपा? क्या कोई साझा राहत पैकेज की मांग की? उत्तर नहीं। और सपनों की दुकानें पहले ही खावा हो चुकी हैं। पर जो स्थान ने भयावह बात है. वह यह नहीं कि आग लगी बल्कि यह कि आग के बाद जो मददगार सामने आए थे यह केवल बोलवचन ही साबित हुए, 100 दिन में आने वाली स्टेबिलिटी रिपोर्ट आनी थी, क्या हुआ पता नहीं, 15 दिन में बीमा कलेम सेटल होने थे, कितने सेटल हुए पत्ता नहीं। व्यापारियों को ती यह भी नहीं पता कि उनकी पूरी बिल्डिंग फिर से बनेगी आधी या बनेगी ही नहीं। यह केवल 1100 व्यापारियों का सवाल नहीं है यह व्यापारियों से जुड़े परिवार और श्रमियों से जुड़ा मामला है। 21वीं सदी के भारत में, एक बड़े व्यापारिक केंद्र में भीषण आग लगती है. करोड़ों की संपति जल जाती है, व्याधार तुप हो जाता है. लोग बेरोजगार हो जाते है और फिर… कुछ नहीं होता।

सुरत के शिवशक्ति मार्केट की यह आग न केवल व्यापारिक

जो कभी नहीं हुआ वह बाजार देख रहा है, पहली बार कपड़ा बाजार में चोची घाट दिखा, पंखा लगाकर साही सुखाते व्यापारी दिखे, वह कहें तो किसे कहे ? टैक्स लेने वाली मनपा, क्या उनके नुकसान का भुगतान करेगी? बिलकुल नहीं, बोलेगा भी कौन? पहले ज्यादा बारिश से किसान चिंतित होते थे अप कफड़ा व्यापारी भी हो रहे है। एमएसएमई के 45 दिन के भुगतान का नियम कागज पर है। कुछ बड़े घरानों के मुनाफे में जरूर वृद्धि हुई है लेकिन छोटा व्यापारी बेहाल है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पिछले दो साल में कितने नए मार्केट बने? दुकानों का किराया कितना बढ़ा? जवाब मिल जाएगा।

समुदाय की चिता थीं, बल्कि यह इस देश की नियोजन विफलता, प्रशासनिक असंवेदनशीलता और नीति निर्माताओं की प्राथमिकताओं की पोल खोलने वाली चिंगारी

कई हफ्ते बीत गए ना तो बिल्डिंग की स्टेबिलिटी रिपोर्ट आई. ना बीमा कंपनियों ने दावे निपटाए, ना ही प्रशासन ने कोई मुआवजा दिया। व्यापारी रोज मार्केट के मलबे को दूर से देखकर केवल यह सोचते रह जाते हैं। “अब क्या करें?’ बीमा कंपनिया यह संस्था है जो “आपदाओं में सहायता” का वादा करती हैं लेकिन जब आपदा आती है तो उनके दरवाजे सबसे पहले बंद हो जाते है। शिवशक्ति मार्केट के व्यापारी वर्षों से मोटा बीमा प्रीमियम चुका रहे थे किसी ने 50 लाख का बीमा लिया, किसी ने 2 करोड़ का। लेकिन जब दुकाने जलकर खाक हो गई तो कंपनियों न्यायिक व्यापारी किसकी तरफ देखो। उसका अपना संगठन जो कभी 70 हजार व्यापारियों का संगठन था अब महज 1100 से 1200 व्यापारियों का संगठन बनकर रह गया। क्योंकि अब फोस्टा को डायमंड, गोल्ड, सिल्वर मेंबर चाहिए। व्यापारी नहीं प्रक्रिया’ का बहाना लेकर  है। बीमा का साम कब मिलेगा? कब मिलेगा क्लेम?

उत्तर है “कुछ नहीं पता। सरकार भी चुप है. बीमा नियामक भी चूर, कंपनियां तो वैसे भी मौन है। व्यापारिक असमानताः माल दिया है तो ब्याज दी, लेकिन व्यापारी का पैसा पाए?

यह सूरत का सबसे क्रूर विरोधाभास है- व्यापारी जो खुद घाटे में है, उसे विचर, मिल डीलर और उत्पादन एजेंसी से माल लेने पर यह साफ-साधा कहा जाता है कि 30 दिन में पैसा नहीं दिया, तो व्याज लगेगा। या आगे से माल नहीं मिलेगा इंसेसर एसोसिएशन से लेकर विवर एसोसिएशन तक के अपने नियम है वह भी अपनी शर्तों में, लेकिन कपड़ा व्यापारियों के भेजे माल का भुगतान कय होगा यह भगवान भरोसे।

जय कर कहता कि अभी पेमेंट नहीं आया

उत्तर मिलता है- “हमें उससे क्या? हमें समय पर भुगतान चाहिए।” यह दोहरा मापदंड नहीं तो और क्या है? जो व्यापारी खुद फसा है, उसे और दबाव में धकेला जा रहा सूरत का सबसे क्रूर विरोधाभास है व्यापारी जो खुद पाटे में है, उसे विवर, मिल डीलर और उत्पादन एजेंसी से माल लेने पर यह साफ-साफ कहा जाता है कि 30 दिन में पैसा नहीं दिया, तो प्याज लगेगा। या आगे से माल नहीं मिलेगा प्रोसेसर एसोसिएशन से लेकर विवर एसोसिएशन तक के अपने नियम है, वह भी अपनी शर्ती में, लेकिन कपड़ा व्यापारियों के भेजे माल का भुगतान कब होगा यह नगदान भरोसे।

उधारी चुकाओं, नहीं तो केस झेलो।

फोस्टा व्यापारी संस्था या मौन दर्शक? जब कोई सामाजिक, व्यापारिक या श्रमिक घटक संकट आता है. ती उम्मीद होती है कि संबंधित संगठन आगे आएगे। सूरत के कपड़ा व्यापारियों के लिए यह उम्मीद थी FOSTTA लेकिन अफसोस इस संस्था की भूमिका समझौता करवाने वाले बलब से आगे नहीं बढ़ी। क्या फोस्टा ने बीमा कंपनियों के खिलाफ मोर्चा खोला? क्या उनसे कोई पत्र व्यवहार किया । 

 

क्या मुख्यमंत्री से खुला संवाद किया? क्या दिल्ली जाकर केंद्रीय कपड़ा मंत्रालय को ज्ञापन सीधा? क्या कोई साझा राहत पैकेज की माग की? उत्तर : नहीं।

हद तो तब हो गई जब 45 लाख का आया दान भी लौटना पड़ा क्योंकि वह इतना कम था कि 1100 व्यापारियों के किसी काम नहीं आता, लेकिन उसका एक अंश भी उस मृतक के परिवार का सहारा बन जाता जिसकी इस हादसे में मैौत हुई थी लेकिन शायद यह प्राथमिकता ने नहीं था मंथन । फोस्टा भी शायद अब एक सर्टिफिकेट छापने वाला संगठन बन गया है. संवेदनशील और संघर्ष करने वाला नहीं। व्यापारियों को कैलाश हकीम से उम्मीदें थी, वह ऐसे फोस्टा के तौर सत्ता के शीर्ष तक राजनीतिक और प्रशासनिक रिश्ते इस यात की बुलंद स्वर में गवाही दे रहे थे कि अब व्यापारियों के अच्छे दिन आने वाले हैं पर सामने आए थे जो तमाम समस्या आई दुर्योधन का नाश करेंगे उनका मिलनसार स्वभाव, ऊंची पहुंच, सत्ता के शीर्ष तक राजनीतिक और प्रशासनिक रिश्ते इस बात की बुलंद स्वर में गवाही दे रहे थे कि अब व्यापारियों के अच्छे दिन आने वाले है माइक में सुरीली आवाज और सिर में देश के कपड़ा उद्योग का एक नहीं दो दो बार नेतृत्व कर चुका फोस्टा आज जीतना असहाय नजर आ रहा है, उतना शायद ही कभी रहा हो, कल ऐसा ना हो फोस्टा और व्यापारी का संपती ही टूट जाए,  दर्द भरे नगमे सुनते तो छोटा व्यापारी झूम उडता । उनकी लोकप्रियता का जलवा यह था कि विपक्षी चो की तरफ से पैनल के लिए प्रत्याशी भी पूरे नहीं मिले जो मिले उनमें से भी आधे से ज्यादा अपना नामांकन वापस ले लिया, वाकी जो बये उन्हें मतदाओं ने सबक सिखा दिया क्योंकि उन्हें मजबूत नेतृत्व चाहिए था। कैलाश जी का बस नाम ही काफी था, उनकी पैनल में कौन कौन है इसकी भी व्यापारियों ने सुध नहीं ली लेकिन अफसोस उसको शायद किस्मत में ही खुद से जूझना लिखा है। जो कभी नहीं हुआ वह बाजार देख रहा है. पहली बार कपड़ा बाजार में धोबी घाट दिखा, पंखा लगाकर साड़ी सुखाते व्याधारी दिखे, वह करें ती किरो कहे ? टैक्स लेने वाली मनया, क्या उनके नुकसान का भुगतान करेगी? बिलकुल नहीं, बोलेगा भी कौन? पहले ज्यादा बारिश से किसान चिंतित होते थे अब कपड़ा व्यापारी भी हो रहे है। एमएसएमई के 45 दिन के भुगतान का नियम कागज है। कुछ बड़े घरानी के मुनाफे में जरूर वृद्धि हुई है लेकिन छोटा व्यापारी बेहाल है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पिछले दो साल में कितने नए मार्केट बने? पर दयानिधि तकाल कृपा कीजिए छोटे व्यापारियों पर  भेट व्यापारी मुसीबत में हैं, उसका दर्द इस कदर ना चढ़ जाए कि भविष्य में उसका बच्चा वाहे कि मेरे भी सूरत में कपड़ा व्यापारी थे। दुकानों का किराया कितना बढ़ा? जधाव मिल जाएगा। एक ऐसे दौर में जब पार्सल और परिवहन से जुड़े संगठन भी ना लेवल अपने नियम बना रहे है बल्कि फोस्टा से मनचा भी ले रहे है, फोगदा बिना किसी चचों के चार लाइन में तीन नियम लाद देती है तब व्यापारी किसकी तरफ देखे। उसका अपना संगठन जो कभी 70 हजार व्यापारियों का संगठन था अब महज 1100 से 1200 व्यापारियों का संगठन बनकर रह गया। क्योंकि अब कोस्टा को डायमंड गोला सिल्वर मेवर चाहिए। व्यापारी नहीं। 100000 से 25000 की कीस चाहिए क्योंकि ऑफिस शानदार बनाना है। कांफ्रेंस रूम अपना चाहिए। सुविधा ज्यादा चाहिए। फिर  छोटा व्यापारी कैसे शामिल होगा। अब ना वह मतदाता हद तो तब हो गई जब आया दान भी लौटना पड़ा क्योंकि वह इतना कम था कि व्यापारियों के किसी काम नहीं आता, लेकिन उसका एक अंश भी उस मृतक के परिवार का सहारा बन जाता जिसकी इस हादसे में मौत हुई थी, लेकिन शायद वह प्राथमिकता में नहीं था। फोस्टा भी शायद अब एक सर्टिफिकेट छापने वाला संगठन बन गया है, संघर्ष करने वाला नहीं रह गया ना उसका संस्था पर कोई दवाव, जिन मतदाताओं ने मार्केट प्रतिनिधि के तौर पर कैलाश जी को चुना था उन्होंने सपनों में भी नहीं नहीं सोचा था कि बतौर मार्केट प्रतिनिधि यह उनका आखिरी मतदान है। सबसे पहले सदस्यता का प्रारूप बदला छोटे मार्केट और छोटे व्यापारियों के लिए मतदान का अधिकार कुचल दिया गया। सामुहिकता की जगह व्यक्तिगत शुल्क ने ले ली। जबकि देश से शायद ही किसी बड़ी संस्था वह सदस्यता शुल्क इतना हो, इतनी फीस नहीं, जो संगठन अपने धाराधोरण बनाकर एकतरफा व्यापारियों पर लाद रहे है, कभी उनकी फीस भी पता करना। लेकिन वह लदवाने में सफल इसलिए क्योंकि उनमें सामूहिकता का भय है। और यहां? इसलिए उनकी वाया श्याम की कृपा आप पर है, आप चाहे तो दो घंटे में स्टेबिलिटी रिपोर्ट आ जाए, आपके संपर्का पर इतना भरोसा ती व्यापारियों को आज भी है. आप इतिहास के सबसे रसूखदार अध्यक्ष है लेकिन पता नहीं क्यों आपकी नज़र छोटे लोगों पर नहीं जा रही । शिवशक्ति मार्केट का यह मृतक मी छोटा आदमी ही था शायद इसीलिए दयानिधान की कृया उसके आश्रितों पर नहीं हुई । संगठन मुखिया की साख से ज्यादा धाक है, चाहे चेंबर ही सियासत। मनु पटेल फोगवा से विधायक मनू पटेल हो गया और अशोक जीरावाला का भावी प्रमुख। जबकि फोस्टा के कितने प्रमुख सपने ही देखते रहे टिकट भी नसीब नहीं हुआ। देश के कपड़ा उद्योग का एक नहीं दो दो बार नेतृत्ता कर चुका पोस्टा आज जीतना असहाय नजर आ रहा है, उतना शायद ही कभी रहा हो कल ऐसा ना हो फोस्ट्रा और व्यापारी का संपर्क ही टूट जाय इसीलिए जिन मतदाताओं ने मार्केट प्रतिनिधि के तौर पर कैलाश जी को चुना था उन्होंने सपनों में भी नहीं नहीं सोचा था कि बतौर मार्केट प्रतिनिधि यह उनका आखिरी मतदान है। सबसे पहले सदस्यता का प्रास्त्य यदला, छोटे मार्केट और छोटे व्यापारियों के लिए मतदान का अधिकार कुचल दिया गया। सामूहिकता की जगह व्यक्तिगत शुल्क ने ले ली व्यापारियों के हित में कैलाश जी एसएमसी से पूछिए कि स्टेविलिटी रिपोर्ट का आएगी, शिवशक्ति मार्केट या भविष्य क्या है कम से कम व्यापारियों को तो बता दीजिए। बीमा कंपनियों पर दवाव बनाने का वक्त आ गया है। जब सबके धाराचोरण पेमेंट को लेकर है तो व्याधारियों के व्यों नहीं। समूह चर्चा कर एक चाराधोरण वो बनाइए, उसका पालन सुनिश्चित कराइप, दलाल रजिस्ट्रेशन की बात तो शायद आप भी भूल गए होगे, उसे लागू करइए। हावा स्थान की कृपा आप पर है. आप चाहे तो दो घंटे में स्टेबिलिटी रिपोर्ट आ जाए, आपके संपकर्ष पर इतना भरोसा तो व्यापारियों को आज भी है. आप इतिहास के सबसे रसूखदार अध्यक्ष है लेकिन पता नहीं क्यों आपकी नजर छोटे लोगों पर नहीं जा रही। शिवशक्ति मार्केट का वह मृतक भी छोटा आदमी ही था शायद इसीलिए दयानिधान की कृपा उसके आभिती पर नहीं हुई। दयानिधि तत्काल कृपा कीजिए छोटे व्यापारियों पर वरना छोटा व्यापारी मुसीबत में है, उसका दर्द इस कदर ना बढ़ जाए कि भविष्य में उसका बच्चा कहे कि मेरे पापा भी सूरत में कपड़ा व्यापारी थे। इतना सब होने के वावजूद सुस्त कर व्यापारी चुप है। वह न सड़क पर उत्तरा, न सोशल मीडिया पर आक्रोश दिखाया न आंदोलन किया। क्या यह सूरत के व्यापारी की सहनशीलता है और कैलाश जी पर विश्वास अब इस विश्वास को बचाने का वक्त है। डायमंड मैवर पैसा दे सकता है लेकिन छोटा व्यापारी आशीर्वाद देगा

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